मुसलमानों के खिलाफ आग उगलने वाले ‘योगी’ का सफर

लखनऊ (प्रदीप कुमार) लव जेहाद और धर्मांतरण जैसे कई मामलों में मुसलमानों के खिलाफ आग उगलने वाले भाजपा के फायरब्रांड नेता और हिंदू युवा वाहिनी के संस्थापक योगी आदित्यनाथ भले ही उत्तराखंड के एक छोटे से गांव में पैदा हुए लेकिन उनकी पूर्वांचल की राजनीति में अच्छी खासी पकड़ अच्छी मानी जाती है। गोरखपुर से सांसद और गोरक्षनाथ पीठ के महंत अजय सिंह बिष्ट से योगी आदित्यनाथ बनने की उनकी कहानी काफी रोचक है। योगी आदित्यनाथ 5 जून 1972 को उत्तरकाशी में जन्मे, गढ़वाल विश्विद्यालय से गणित में बीएससी किया और 15 फरवरी 1994 को गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी बन बैठे। इसके बाद लोकसभा में में सबसे कम उम्र के सांसदों की सूची में नाम दर्ज कराकर राजनीति के रंग में रंग गये। इसी दौरान गोखनाथ मंदिर के महंत अवैद्यनाथ ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया जिसके बाद 1998 में वह सांसद चुने गए। योगी आदित्यनाथ जब 12वीं लोकसभा में सांसद बनकर पहुंचे तब उनकी उम्र मात्र 26 साल थी। इसके बाद आदित्यनाथ 1999, 2004, 2009 और 2014 में भी लगातार सांसद बने। योगी धर्मांतरण के खिलाफ और घर वापसी के लिए काफी चर्चा में रहे। 2005 में योगी आदित्यनाथ ने एटा जिले में कथिततौर पर 1800 ईसाइयों का धर्मांतरण कराकर हिन्दू धर्म में शामिल करवाया। इसके बाद पचरुखिया कांड, मोहनमुंडेरा कांड में दलित मुस्लिम संघर्ष के बाद मुस्लिमों के घर फूंकने का मामले के अलावा 2007 में गोरखपुर दंगे के आरोप में योगी आदित्यनाथ एक महीने सलाखों के पीछे भी रहे।
कट्टर हिंदूवादी चेहरे के कारण मिली यूपी की कमान
सूत्रों की मानें तो उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में योगी आदित्यनाथ को सीएम बनाने की घोषणा के वक्त बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की गैरमौजूदगी ये बताती है कि पीएम मोदी योगी को यूपी की कमान देने को तैयार नहीं थे, लेकिन आदित्यनाथ की हथधर्मिता और कट्टर हिंदूवादी चेहरे के चलते आरएसएस और बीजेपी किसी भी कीमत पर योगी का राजतिलक करना चाहती थी। इसे मोदी और आरएसएस दोनों के अपने-अपने अस्तित्व और वजूद की लड़ाई के तौर पर देख सकते हैं। जानकारों का मानना है कि पिछले कुछ सालों में नरेंद्र मोदी देश में बेहद ताकतवर नेता के तौर पर उभरे हैं, जिनकी काट फिलहाल किसी दूसरे नेता में नहीं दिखती। बहुसंख्यक का एक बड़ा वर्ग नरेंद्र मोदी में हिन्दू ह्रदय सम्राट की छवि देखता है। और उसी छवि को पीएम ने देश के सामने एक मज़बूत ब्रांड के तौर पर पेश किया है। मोदी के उभार की वजह से आरएसएस की चमक भी पिछले दो सालों में कुछ फीकी पड़ी है, क्योंकि पीएम ने आरएसएस की चकाचौंध को भी एक प्रकार से हाईजैक कर उसपर अपने ब्रांड का गोल्ड मैडल चस्पा डाला है। यही बात आरएसएस को खल रही थी। कोई भी बड़ा फैसला अब आरएसएस की जगह खुद पीएम मोदी लेते हैं। यही वजह थी की मनोज सिन्हा का नाम तय होने के बावजूद आखिरी वक़्त में योगी का राज्याभिषेक किया गया।

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